श्रीमद् भागवत महापुराण व श्रीमद् देवी भागवत महापुराण में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही हैं। यह 18 महापुराणों में एक है। वेद को चार भागों में विभक्त करने वाले, महाभार, 18 पुराण व ब्रह्मसूत्र के रचयिता महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास जी महाराज द्वारा रचित इस महापुराण में 12 स्कंध, 318 अध्याय व 18 हजार श्लोक हैं। ये बातें वृंदावन से आए कथा वाचक आचार्य बालशुक गोपेश जी महाराज ने सोमवार को कहीं। वह रातू रोड स्थित रतन लाल जैन स्मृति भवन में आयोजित नौ दिनी श्रीमद् भागवत कथा के पहले दिन भक्तों का कथा का रसपान करा रहे थे। मौके पर उन्होंने श्रीमद् देवी भागवत महापुराण का महत्व बताते हुए कहा कि भगवती मां आद्या सनातनी शक्ति मां दुर्गा की साक्षात् वांगमय विग्रह हैं। बिना शक्ति के किसी भी प्राणी- पदार्थ की गति संभव ही नहीं है। मां जिनको कहा गया है, उनके 51 शक्तिपीठ हैं। वैष्णो, चामुण्डा, महाकाली, अम्बिका, दुर्गा आदि- आदि नामों से प्रसिद्ध भगवती मां के कृपामय चरित्रों का सागर है श्रीमद़ देवीभागवत महापुराण। कथा में बहुत ही सुन्दर मातारानी की झांकी भी प्रस्तुत की गई.

जगदंबा की कृपा से सुद्दुम्न ने प्राप्त किया था पुरुषत्व

आचार्य बालशुक गोपेश जी महाराज ने व्यासगद्दी से श्रीमद् देवी भागवत कथा का विस्तार से निरूपण करते हुए कहा कि स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड में 5 अध्यायों में वर्णित प्रथम महात्म्य की कथा है। इसमें वैवस्वत मनु के पुत्र सुद्युम्न की कथा है, जो आदिदेव महादेव भगवान शिव के बनाए किम्पुरुष नामक क्षेत्र में प्रवेश कर स्त्री बन गए थे। उन्होंने जगदम्बा मां की कृपा से सदा के लिए पुरुषत्व प्राप्त किया। भगवान श्री कृष्ण मणि प्रसंग में जब जाम्बवान से युद्ध कर रहे थे, तो भगवान श्री नारद जी की प्रेरणा से श्री वसुदेव जी ने नवाह यज्ञ किया। विप्रदेवों को दक्षिणा बांटकर आशीर्वाद ले ही रहे थे कि श्री कृष्ण का वहां सपत्नीक आगमन हुआ। मां के ही एक भक्त ने मातारानी की कृपा से रेवती नक्षत्र जिसका पतन हो गया था, उसकी स्थापना की। जगदम्बा मां की कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है।

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