जन्म कुण्डली में जिस प्रकार सूर्य के दोनों ओर के ग्रहों की स्थिति से वेली, वासि और उभयचारी तथा चन्द्रमा से अनफा, सुनफा, दुर्धारा और केमद्रुम योग तथा शनि चन्द्र की युति से विष, गुरु, राहु, युति से चांडाल आदि-आदि योग बनतें है। उसी प्रकार राहु-केतु द्वारा राहु और केतु की एक ही बाजू में सभी ग्रह स्थित हो जाऐं तो उसे काल सर्प योग कहतें है। सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण भी काल के (राहु के मुख में) सम्मुख सूर्य या चन्द्रमा के आनेपर होतें है। उसी प्रकार जब सभी ग्रह उसी नागपुरुष के जाल में अटक जातें हैं तो भारी अनिष्ट करतें है। मत है कि राहु-केतु के मध्य 288 काल सर्पयोग बनतें है। किन्तु निम्नलिखित 12 योग विशेष प्रभावकारी माने गये है-
1. अनन्त काल सर्प-1 से 7 भाव तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों से
2. कुलिक कालसर्प-2 से 8 भावों तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों से
3. वासुकी कालसर्प-3 से 9 भावों तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों से
4. शंखपाल कालसर्प-4 से 10 भावों तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों
5. पù कालसर्प -5 से 11 भावों तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों से
6. महा पù कालसर्प-6 से 12 भावों तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों
7. तक्षत कालसर्प-7 से 1 भावों तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों से
8. कर्कोटक कालसर्प-8 से 2 भावों तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों
9. शंखचूड़ कालसर्प-9 से 3 भावों तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों
10. घाटल कालसर्प-10 से 4 भावों तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों से
11. विषधर कालसर्प-11 से 5 भावों तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों
12. शेषनाग कालसर्प-12 से 6 भावों तक राहु-केतु के मध्य ग्रहों
विशेष :- कालसर्प योग के लिए आवश्यक है कि राहु से केतु की ओर सभी ग्रह होना चाहिए न कि केतु से राहु की ओर हों क्यों कि राहु की उल्टी गति होती है।
हस्तसामुद्रिक शास्त्र के अनुसार- हथेली पर जीवन रेखा के अंत में उल्टा मत्स्य चिन्ह टूटी हुई रेखाओं से बना होतो काल सर्पयोग की छाया माननी चाहिए।
मानसागरी के चौथे अध्याय का दसवां श्लोक कहता है शनि, सूर्य और राहु जन्मांक में लग्न से सप्तम स्थान में होतो सर्पदंश अर्थात् कालसर्प येग होगा।
राहु का जन्म नक्षत्र भरणी और केतु का श्लेषा माना गया है। भरणी नक्षत्र के देवता काल तथा श्लेषा के देवता सर्प हैं। नक्षत्र देवताओं के नामों को जोड़ कर कालसर्प नये शब्द का निर्माण हो जाता है। विद्वानों का मत है कि उक्त नक्षत्रों में जन्में व्यक्ति भी कालसर्प येग से प्रभावित मानें जायेंगे।
कृष्ण पक्ष की अमावश्या तिथि के उत्तरार्द्ध में स्थाई नागकरण तथा नाग येनि में जन्में व्यक्ति भी कालसर्प के पाये गये है। येग रत्नाकर कहता है कि –
न शमं याति ये व्याधिः ज्ञेयः कर्मजो बुधः ।
पुण्य भेषजे शान्तस्ते ज्ञेया कर्म दोषजाः ।।
अर्थात् कोई माने या न माने कालसर्प योग अस्तित्व में जरूर है। किसी के न मानने से शास्त्र अपना सिद्धांत नहीं बदलते। यह योग स्वयं प्रमाणित है।
कालसर्प योग का प्रभावः-
कालसर्प योगी व्यक्ति के लिए विद्वानों का मत है कि इस योग का व्यक्ति प्रारब्ध के हाथ का खिलौना है उनका पुरुषार्थ राहु-केतु के वस में रहता है। इनका जीवन कर्म येग के लिए ही होता है। ये अत्यधिक संवेदनशील स्वभाव के तथा अस्थिइ प्रवृत्ति के होतें है। इस लिए ये अपना अधिकांश समय दूसरों के लिए लगातें है। जिसके कारण घर में इन्हे लापरवाह और गैर जिम्मेदार की संज्ञा दी जाती है। इनका जीवन संघर्ष से ओत-प्रोत होता है। एैहिक सुख का अभाव, असाध्यकारी बीमारी, संतान, रोजगार, सम्पत्ति संबंधी बाधाएं अचानक ही उमड़ पड़ती है। एैसा लगता है किसी नें इन्हें चोटी से खाई में धकेल दिया है। और कभी खाई से चोटी में भी आकस्मिक छल्लांग लगा जातें है। इन्हें स्वप्न अधिक आतें है। स्वप्न में सर्प या सर्पदंश करते हुए दिखाई देतें है। नींद में घबराहट होती है। चौंक-चौक कर उठतें है व पसीनें-पसीनें हो जातें है।
विशेष-कालसर्प योग एक विशिष्ट योग है। जिसके प्रभाव से व्यक्ति अभूतपूर्व ऊर्जा वाला, मेहनती, परोपकारी, खुले हृदय का होता है क्योकि उसकी नाडी जागृत अवस्था में होती है। ध्यान रखें कि राहु और केतु के मध्य सभी ग्रह दिखने मात्र से कुण्डली कालसर्प योग की नही होती। योग्य ज्योतिषी से इसका पूर्ण विचार कराकर इसको जाने और डरें नही। कम जानकार ज्योतिषी लोगों को इस योग से प्रभावित बताकर अनावश्यक भयभीत करते रहते है।
भय तथा नजर अधिक लगती है ये लोग शंकर जी के अनन्त भक्त और शंकरजी जैसा जल्दी स्वभाव बदलनें वाले होतें है। दुर्गा उपासना इनके दूसरे ईष्ट है।
कालसर्प योग तीव्र कब होगा- जन्म कुण्डली में जब
(1) चाण्डाल योग हो :- राहु एवं गुरु की युति हो।
(2) ग्रहण योग हो :- राहु-सूर्य या राहु-चन्द्र एक साथ हो।
(3) केमद्रुम योग हो :- चन्द्रमा से 2-12 भाव में ग्रह न हों।
(4) अंगारक योग हो :- राहु-मंगल एक साथ हों।
(5) जडत्व योग हो :- बुध-राहु की युति हो।
(6) नन्दी योग हो :- राहु-शनि युति करें।
(7) महादशा, अर्न्तदशा, प्रत्यर्न्तरदशा में से कोई भी चलनें पर
(8) गोचर में राहु अशुभ चलता हो।
(9) गोचर से कालसर्प योग की दृष्टि हो।
उपर्युकत योग एवं समय में कालसर्प योग का प्रभाव अधिक होता है। जो ग्रह कालसर्प के मुख में पड़तें है या दृष्टि होती है अथवा अशुभ स्थानों में स्थिति होती है उन्ही ग्रह के कारकों एवं विषयों संबंधित वस्तुओं, व्यक्तियों की हानि करता है। उदाहरण- यदि शुक्र राहु की युति करे या राहु से पंचम, सप्तम या नवम् रहे तो स्त्री जन्य कष्ट देगा।
कालसर्प योग कब भंग होगा :- जब
(1) राहु के अंश से ग्रहों के अंश अधिक हों।
(2) शुभ ग्रह मजबूत स्थिति में हो।
(3) एक भी ग्रह उच्च या स्वग्रही हो।
(4) छत्र योग बनता हो :- सप्तम से लग्न तक सभी ग्रह हो।
(5) नौका योग हो :- लग्न से सप्तम के मध्य सभी ग्रह हो।
(6) पंचमहापुरुष योग हो :- मालव्य, हंश, शशक, रुचक, भद्र
(7) बुधादित्य योग हो :- सूर्य-बुध एक साथ रहे।
(8) लक्ष्मी योग हो :- चन्द्र मंगल की युति केन्द्र में या 1,8,10 राशि पर मंगल रहे एवं चन्द्रमा उसके साथ रहे।
कालयर्प योग का उपायः- जिस जातक की कुण्डली मे कालसर्पयोग हो उसे निम्नलि़खत उपाय करना चाहिये :-
1. शंकरजी की पूजा,लघु्र, महारुद्र, अभिषेक सोमवार को करें।
2. चांदी की नाग प्रतिमा का प्रतिदिन अभिषेक पूजा इत्यादि करें तथा अभिषेक का जल नित्य ग्रहण करें।
3. नागस्त्रोत का पाठ प्रतिदिन नौ बार करें ।
4. ओम नमः शिवाय मंत्र का प्रतिदिन जप करें।
5. नागप्रमितमा की अंगूठी धारण करें।
6. नागपंचमी का व्रत, नागपूजा करें, सर्प की रक्षा करें।
7. राहु रत्न गोमेद मध्यमा या लाकेट में सदैव धारण करें।
8. कुल देवता की उपासना करें।
9. राहु या केतु के साथ चन्द्र या सूर्य हों तो लहसुनिया पहने।
10. सोना, शीशा, काला तिल, नीला वस्त्र, घोड़ा, नारियल, कम्बल हैसियत मुताबिक दान करें।
11. काली गौ माता की सेवा करें।
12. कालसर्प यन्त्र का विधिवत पूजन कर धारण करें।
13. घर या कार्यालय में मयूर पंख रखे।
14. चन्दन की चौकोर लकड़ी के तुकड़े पर चांदी का एक नाग युगल बना कर रखें या गले में बांधे।
15. बटुक भैरव मंत्र का सवा लाख जप करें।
16. शिवलिंग पर तांबे का सर्प विधिविधान से चढ़ावें।
17. लोहे का युगल सर्प बनवाकर बहतें पानी में बहाये।
18. श्री कार्त विर्यार्जुन मंत्र का रोज 32 हजार बार जप करें।
19. राहु के तन्त्र का मंत्र से सोम या गुरुवार अनुष्ठान करें।
20. घर के चौखट पर चांदी का स्वास्तिक लटकाये।
21. रसोई घर में ही बैठ कर भोजन करें।
22. लाल रंग की वस्तुऐं शयन कक्ष में उपयोग में लायें।
23. अपनी ही पत्नी से दुबारा विवाह करायें।
24. गौ मूत्र से दांत साफ किया करें।
25. भाद्रपद में 16 पितृ श्राद्ध प्रतिवर्ष श्रद्धा पूर्वक करें।
26. श्रावण माह में लघु रुद्र या महा रुद्र की पूजा करें।
27. जैन मतावलंबी विषधर स्फुलिंग मंत्र का रोज पाठ करे।
28. नित्य पार्थिवेश्वर पूजन रुद्राभिषेक सहित पांच साल करें।

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