किसी भी कार्य को संपादित करने के लिए सही दिन, सही समय अर्थात शुभ मुहूर्त का चुनाव ही उस कार्य में त्वरित सफलता दिलाता है। वैदिक काल से लेकर आज तक किसी भी कार्य को करने से पहले शुभ मुहूर्त देखने की परंपरा रही है। शुभ मुहूर्त में किया गया कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न होता है, ऐसा ऋषि-मुनियों का वचन है तथा यह अनुभवजन्य भी है।

अपनी संपूर्ण जीवन यात्रा में जिसने समय को पहचान लिया अर्थात समय के अनुसार कार्य करने लगा, वैसा व्यक्ति अवश्य ही सफल होता है। उसकी सफलता में संदेह नहीं होता। सामान्यत: लोगों के मुंह से यह शब्द निकलता है कि आज का दिन बहुत अच्छा था, सब काम अपने निर्धारित समय से पूरा हो गया परंतु क्यों? क्योंकि आज हम सही समय पर घर से निकले थे और एकदम सही समय पर कार्यस्थल पर पहुंच गए थे।

वस्तुत: किसी कार्य का तुरंत हो जाना या अल्प प्रयास में ही हो जाना यह सब जाने अनजाने में शुभ मुहूर्त/समय का ही परिणाम है। यह इसलिए जरूरी है कि हम व्यवहार में सुख दु:ख, अच्छा-खराब, सफलता-असफलता का स्वाद दिन-प्रतिदिन लेते रहते हैं तथा दिनचार्य में शुभ-अशुभ भी अनुभूति करते रहते हैं।

यह स्वाभाविक-सी बात है कि इस अशुभ समय में किया गया कार्य या तो पूर्ण नहीं होगा या विलंब से होगा या व्यवधान के साथ होगा या नहीं भी हो सकता है। परंतु नकारात्मक विचार रखने वाले यह भी कह सकते हैं कि क्या गारंटी है कि शुभ समय में किया गया कार्य पूरा हो ही जाए या उसमें कोई व्यवधान न हो। लेकिन यह सच है कि अशुभ समय के चयन से तो शुभ समय का चयन अच्छा ही होगा, क्योंकि यदि अच्छा मुहूर्त हमारा भाग्य नहीं बदल सकता तो कार्य की सफलता के पथ को सुगम तो बना सकता है।

शुभ मुहूर्त आपके भविष्य को बदले या न बदले, परंतु जीवन के प्रमुख कार्य शुभ मुहूर्त में करते हैं तो आपका जीवन निश्चित ही आनंददायक बन जाएगा। अत: हमें अवश्य ही शुभ समय का चयन करना चाहिए।

कैसे बनता है शुभ मुहूर्त?

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुभ मुहूर्त निकालने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखा जाता है- तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, नवग्रहों की स्थिति, मलमास, अधिकमास, शुक्र और गुरु अस्त, अशुभ योग, भद्रा, शुभ लग्न, शुभ योग तथा राहूकाल आदि इन्हीं के योग से शुभ मुहूर्त निकाला जाता है यथा सर्वार्थसिद्धि योग। यदि सोमवार के दिन रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, अनुराधा तथा श्रवण नक्षत्र हो तो सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण होता है।

शुभ मुहूर्तों में सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त माना जाता है- गुरु-पुष्य योग। यदि गुरुवार को चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में हो तो इससे पूर्ण सिद्धिदायक योग बन जाता है। जब चतुर्दशी सोमवार को और पूर्णिमा या अमावस्या मंगलवार को हो तो सिद्धिदायक मुहूर्त होता है। इस योग में किया गया कार्य शीघ्र ही पूरा हो जाता है। अर्थात शुभ योगों की गणना कर उनका उचित समय पर जीवन में इस्तेमाल करना ही शुभ मुहूर्त पर किया गया कार्य कहलाता है। अशुभ मुहूर्त में योगों में किया गया कार्य पूर्णत: सिद्ध नहीं होता।

स्कूल-कॉलेज में बच्चों के प्रवेश का शुभ मुहूर्त 

बच्चों का प्रथम बार विद्यालय में नाम लिखवाना बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि दांपत्य जीवन में बच्चों के आगमन के बाद सभी कार्य बच्चे के भविष्य को ध्यान में रखकर ही किए जाते हैं। माता-पिता तो यही कहते हैं कि अगर बच्चे ने अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त कर लिया तो मेरा जीवन सफल हो गया।

जब भी किसी विद्यालय में प्रवेश कराते हैं तो प्रवेश/ दाखिले के लिए निर्धारित शुभ मुहूर्त समय के अनुसार ही प्रवेश कराएं, क्योंकि प्रवेश काल ही बच्चों की पढ़ाई के शुभ और अशुभ परिणाम का निर्धारण करता है।

नोट : कोई भी शुभ कार्य करने के लिए उस दिन आपका चन्द्रमा मजबूत होना चाहिए एवं आपको अपने कार्य स्थिर लग्न में करने चाहिए

कुण्डली का मुहूर्त्त से संबंध –
जन्म कुण्डली अनुकूल मुहूर्त्त का निर्धारण करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. जन्म समय की ग्रह
स्थिति को बदला तो नहीं जा सकता लेकिन शुभ समय मुहूर्त्त को अपना कर कार्य को सफलता की और उन्मुख
किया जा सकता है. ज्योतिष के अनुसार कुण्डली के दोषों के प्रभाव से बचने के लिए यदि अच्छी दशा में तथा शुभ गोचर में शुभ मुहूर्त्त का चयन किया जाए तो कार्य की शुभता में वृद्धि हो सकती है.
शुभ मुहूर्त कौन से हैं?
शुभ मुहूर्त कुल 15 है। शुभ मुहूर्त में रुद्र, श्‍वेत, मित्र, सारभट, सावित्र, वैराज, विश्वावसु, अभिजित, रोहिण, बल, विजय, नैरऋत, वरुण सौम्य और भग ये 15 मुहूर्त हैं। अमृत/जीव मुहूर्त और ब्रह्म मुहूर्त बहुत श्रेष्ठ होते हैं

उक्त मुहूर्त में क्या करें?
*रुद्र में सभी प्रकार के मारणादि प्रयोग, भयंकर एवं क्रूर कार्य।
*श्‍वेत में नए वस्त्र धारण, बगीचा लगाना, कृषि कार्यो का आरंभ आदि या इसी तरह
के अन्य कार्य करना चाहिए।
*मित्र में मित्रता, मेल-मिलाप और संधि आदि के कार्य करें।
*सारभट में शत्रुओं के लिए अभिचार कर्म करना।
*सावित्र में सभी प्रकार के यज्ञ, विवाह, चूडाकर्म, उपनयन, देवकार्य आदि संस्कार
किए जाते हैं।
*वैराज में पराक्रम के कार्य, शस्त्रों का निर्माण, वस्त्रों का दान आदि किया जाता है।
*विश्वावसु द्विजाति के स्वाध्याय संबंधी सभी कार्य एवं अर्थ सिद्धि के कार्य किए जाते हैं।
*अभिजित में सभी वर्ण एवं जाति के मेल-मिलाप संबंधी कार्य, धन संग्रह, यात्रा आदि
के कार्य किए जाते हैं। यह मुहूर्त सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने वाला भी माना गया है।
*रोहिणी में पेड़, पौधे, बेल, लताएं आदि लगाए जाते हैं। इससे वे निरोग रहकर उन पर सर्वदा ही सुन्दर फल एवं फूल लगे रहते हैं।
*बल में सेनाओं का संचालन और आक्रमण करने का कार्य किया जाता है जिसके चलते विजय अवश्य प्राप्त होती है।
*विजय में स्वस्ति वाचन तथा शांति पाठ आदि मंगलाचार कार्यो को संपन्न किया जाता है। किसी देश आदि पर चढ़ाई करने के लिए यह मुहूर्त श्रेष्ठ होता है।
*नैरऋत में शत्रुओं के राष्ट्रों पर आक्रमण करना शुभ होता है। इस मुहूर्त में आक्रमण करके उनकी संपूर्ण सेना को नष्ट किया जा सकता है।

*वरुण में जल में उत्पन्न होने वाले धान्य, गेंहूं, जौ, धान, कमल आदि के बीज बोना शुभ होता है। सौम्य में सभी तरह के मांगलिक या शुभ कार्य सफल होते हैं।
*भग में कन्याओं के सौभाग्य कार्य अर्थात पाणिग्रहण संस्कार को करना शुभ होता
है।
विशेष मुहूर्त योग : सर्वार्थसिद्धि, अमृतसिद्धि, गुरुपुष्यामृत और रविपुष्यामृत योग। यदि सोमवार के दिन रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, अनुराधा तथा श्रवण नक्षत्र हो तो सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण होता है। शुभ मुहूर्तों में सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त माना जाता है- गुरु-पुष्य योग। यदि गुरुवार को चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में हो तो इससे पूर्ण सिद्धिदायक योग बन जाता है। जब चतुर्दशी सोमवार को और पूर्णिमा या अमावस्या मंगलवार को हो तो सिद्धिदायक मुहूर्त होता है।
इस समय में ना करें मांगलिक कार्य :
1. पंचकों में ये कार्य निषेध माने गए हैं- श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्रप्रद तथा रेवती नक्षत्रों में पड़ने वाले पंचकों में दक्षिण की यात्रा, मकान निर्माण, मकान छत डालना, पलंग खरीदना-बनवाना, लकड़ी और घास का संग्रह करना, रस्सी कसना और अन्य मंगल कार्य नहीं करना चाहिए। किसी का पंचकों में मरण होने से पंचकों की विधिपूर्वक शांति अवश्य करवानी चाहिए।

2. बुधवार और शुक्रवार के दिन पड़ने वाले पुष्य नक्षत्र उत्पातकारी भी माने गए है। ऐसे में शुभ कार्यों से बचना चाहिए। जैसे विवाह करना, मकान खरीदना, गृह प्रवेश आदि। रवि तथा गुरु पुष्य योग सर्वार्थ सिद्धिकारक माना गया है।

3. रविवार, मंगलवार, संक्राति का दिन, वृद्धि योग, द्विपुष्कर योग, त्रिपुष्कर योग, हस्त नक्षत्र में लिया गया ऋण कभी नहीं चुकाया जाता। अंत: उक्त दिन में ऋण का लेना-देना भी निषेध माना गया है।

शुभ मुहूर्त में क्या करें?
1. गर्भाधान, पुंसवन, जातकर्म-नामकरण, मुंडन, विवाह आदि संस्कार।
2. भवन निर्माण में मकान-दुकान की नींव, द्वार, गृहप्रवेश, चूल्हा भट्टी आदि का शुभारंभ।
3. व्यापार, नौकरी आदि आय प्राप्ति के साधनों का शुभारंभ।
4. पवित्रता हेतु किए जाने वाले स्नान।
5. यात्रा और तीर्थ आदि जाने के लिए भी शुभ मुहूर्त को देखा जाता है।
6. स्वर्ण आभूषण, कीमती वस्त्र आदि खरीदना, पहनना।
7.वाहन खरीदना, यात्रा आरम्भ करना आदि।
8. मुकद्दमा दायर करना, ग्रह शान्त्यर्थ रत्न धारण करना आदि।
9. किसी परीक्षा प्रतियोगिता या नौकरी के लिए आवेदन-पत्र भरना आदि।